परचन कल म शकष क मधयम स समजक परवरतन क अधययन
सारांश प्राचीन काल में शिक्षा केवल ज्ञानार्जन का माध्यम नहीं थी, बल्कि यह समाज के नैतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं सामाजिक विकास का आधार भी थी। शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास किया जाता था तथा उसे समाजोपयोगी, उत्तरदायी एवं नैतिक नागरिक बनने के लिए तैयार किया जाता था। वैदिक, बौद्ध एवं जैन शिक्षा परंपराओं ने भारतीय समाज में सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को गति प्रदान की। वैदिक काल में गुरुकुल व्यवस्था ने समानता, अनुशासन, आत्मनिर्भरता, श्रम की गरिमा तथा गुरु-शिष्य परंपरा जैसे मूल्यों का विकास किया। यद्यपि उस समय शिक्षा पर कुछ सामाजिक सीमाएँ भी थीं, फिर भी शिक्षा ने समाज में नैतिकता एवं सामाजिक उत्तरदायित्व को सुदृढ़ किया। बौद्ध एवं जैन शिक्षा संस्थानों ने शिक्षा को अधिक लोकतांत्रिक एवं व्यावहारिक स्वरूप प्रदान किया, जिससे जाति, वर्ग एवं लिंग आधारित भेदभाव को चुनौती मिली। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला एवं वल्लभी जैसे प्राचीन विश्वविद्यालयों ने ज्ञान-विज्ञान, चिकित्सा, दर्शन, गणित, ज्योतिष एवं साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय शिक्षा की प्रतिष्ठा स्थापित की। प्राचीन शिक्षा व्यवस्था ने सामाजिक एकता, सांस्कृतिक संरक्षण, नैतिक मूल्यों के संवर्धन तथा ज्ञान के प्रसार के माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन उत्पन्न किए। शिक्षा ने व्यक्ति में कर्तव्यबोध, सहिष्णुता, आत्मसंयम एवं लोककल्याण की भावना का विकास किया, जिससे सामाजिक समरसता को बल मिला। इसके साथ ही शिक्षा ने भारतीय संस्कृति, भाषा, साहित्य एवं दर्शन की समृद्ध परंपराओं को संरक्षित एवं विकसित किया। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था के लिए भी प्राचीन शिक्षा के अनेक सिद्धांत, जैसे मूल्यपरक शिक्षा, अनुभवात्मक अधिगम, चरित्र निर्माण तथा समग्र व्यक्तित्व विकास अत्यंत प्रासंगिक हैं। यह अध्ययन प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था के सामाजिक परिवर्तन में योगदान का अध्ययन प्रस्तुत करता है तथा समकालीन शिक्षा में उसकी उपयोगिता को रेखांकित करता है।
Authors
- रविन्द्र कुमार
Publication Details
- Journal
- Zenodo (CERN European Organization for Nuclear Research)
- Published
- 2026-09-30
- DOI
- https://doi.org/10.5281/zenodo.23052911
- Type
- article