उततर एव दकषण छटनगपर म परयटन और आदवस जञन परणल: ससकतक परदशय, समत और सतत वकस
उत्तरी एवं दक्षिणी छोटानागपुर क्षेत्र भारत के उन विशिष्ट भौगोलिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में सम्मिलित हैं जहाँ प्राकृतिक पर्यावरण, आदिवासी समाज, धार्मिक आस्थाएँ और ऐतिहासिक स्मृतियाँ परस्पर गहराई से जुड़ी हुई हैं। पर्यटन संबंधी विमर्श में इस क्षेत्र को प्रायः प्राकृतिक सौंदर्य, जलप्रपातों, वन क्षेत्रों और धार्मिक तीर्थों तक सीमित कर दिया जाता है, जबकि यहाँ की आदिवासी ज्ञान प्रणाली, सांस्कृतिक स्मृति और जीवित परिदृश्य अपेक्षाकृत उपेक्षित रहते हैं। यह शोध-लेख पर्यटन को केवल आर्थिक गतिविधि के रूप में न देखकर, उसे आदिवासी ज्ञान प्रणाली और सांस्कृतिक परिदृश्य के व्यापक संदर्भ में समझने का प्रयास करता है। अध्ययन का उद्देश्य यह विश्लेषण करना है कि किस प्रकार पारंपरिक आदिवासी ज्ञान—जैसे प्रकृति-पूजा, भूमि-संस्कृति, कृषि चक्र, लोककथाएँ और सामुदायिक अनुष्ठान—पर्यटन के वैकल्पिक और सतत मॉडल का आधार बन सकते हैं। यह लेख द्वितीयक स्रोतों, अंतरराष्ट्रीय पर्यटन साहित्य और क्षेत्रीय अध्ययनों के विश्लेषण पर आधारित है। अध्ययन यह प्रतिपादित करता है कि यदि पर्यटन विकास को आदिवासी स्मृति, सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक सहभागिता के साथ जोड़ा जाए, तो यह न केवल सांस्कृतिक संरक्षण को सुदृढ़ करेगा, बल्कि स्थानीय आजीविका और सामाजिक गरिमा को भी सशक्त बनाएगा।
Authors
- अर्चना राणा
Institutions
- Institute of Physics of the Slovak Academy of Sciences (SK)
Publication Details
- Journal
- International Journal of Technology & Emerging Research
- Published
- 2026-06-13
- DOI
- https://doi.org/10.64823/ijter.2602003
- Type
- article