"बदध कलन दस परथ"
भारत में जाति भेद का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। परंतु आरंभिक युग में यह रूढ़ नहीं था। ऋग्वेदकालीन भारतीय समाज में ब्राह्मण, राजन्य वैश्व एवं शूद्र वर्णो का अस्तित्व समाज के चतुवर्ग के सदृश्य था। व्यक्ति विशेष को यह अधिकार था कि वह अपने मनोकुल वर्ण का सदस्य बन सके। तीनों उच्च वर्ग के बीच स्पष्ट विभाजन भी नहीं था यदि कोई स्पष्ट विभाजन था भी तो वह आर्य तथा दास अथवा दास्यु के बीच था। बुद्ध युग में जाति भेद अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गया एवं जाति के अनुसार ऊँच नीच की भावना अति प्रबल हो गयी।
Authors
- डॉ शालिनी कुमारी
Institutions
- Weatherford College (US)
Publication Details
- Journal
- Zenodo (CERN European Organization for Nuclear Research)
- Published
- 2026-04-15
- DOI
- https://doi.org/10.5281/zenodo.20020142
- Type
- article