कवप क अनदत उपनयस म ससकतक समतलयत
प्रस्तुत शोध पत्र कन्नड़ साहित्यकार कुवेंपु के हिंदी अनूदित उपन्यासों में &सांस्कृतिक समतुल्यता* की अवधारणा का विश्लेषण करता है। यह अध्ययन दर्शाता है कि कैसे अनुवादक ने शाब्दिक अनुवाद से परे जाकर मूल पाठ के सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश को सुरक्षित रखा है। &हच्चे* के लिए &गोदना* और &तुलसीकट्टे* के लिए &वृंदावन* जैसे उदाहरणों के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि सांस्कृतिक प्रतिस्थापन हिंदी पाठकों के लिए ग्रामीण कर्नाटक के धार्मिक और लोक संदर्भों को जीवंत बनाए रखता है। निष्कर्षतः, ये अनुवाद भाषाई सीमाओं को पाटते हुए भारतीय साहित्य को समृद्ध करते हैं और लक्ष्य भाषा में मूल भावों को प्रभावी ढंग से संप्रेषित करते हैं।
Authors
- राजशेखर उमेश जाधव
Publication Details
- Journal
- Zenodo (CERN European Organization for Nuclear Research)
- Published
- 2026-01-30
- DOI
- https://doi.org/10.5281/zenodo.18330748
- Primary Topic
- Military Technology and Strategies
- Type
- article
- Field-Weighted Citation Impact
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